यह ग्रंथि अखरोट के आकार की एक गोलाकार और सख्त ग्रंथि होती है, जो तंतुमय ऊतक एवं चिकनी पेशी के पतले, मजबूत सम्पुट (capsule) से ढकी रहती है। यह ग्रंथि मलाशय के सामने, मूत्राशय के नीचे और मूत्रमार्ग (urethra) के पहले भाग को चारों तरफ से घेरे हुए स्थित रहती है। । प्रोस्टेट ग्रंथि अंदर से तीन तरह की ग्रंथियों से मिलकर बनती है, जो अपने स्रावों को अलग-अलग वाहिकाओं से होकर मूत्रमार्ग के प्रोस्टेटिक भाग में पहुंचाती है-
1. सबसे अंदर की श्लेष्मल ग्रंथियां (Mucosal glands) श्लेष्मा का स्राव करती है। ये छोटी-छोटी ग्रंथियां कभी-कभी बूढ़े व्यक्तियों में प्रदाहित तथा विबृर्द्धित (बड़ी) (enlarged) हो जाती है। इसके कारण मूत्रमार्ग संकरा हो जाता है तथा मूत्र त्याग में परेशानी होती है।
2. बीच की ग्रंथियां (Submucosal glands) किसी भी तरह के श्लेष्मा का स्राव नहीं करती है।
3. बाहरी प्रोस्टेटिक ग्रंथियां पतला, चिकना और अम्लीय द्रव का स्राव करती है, जिसमें मुख्यतः पानी, एसिड फॉस्फेटेज, कॉलेस्ट्रॉल, लवण एवं फॉस्फोलिपिड्स मौजूद रहते हैं। प्रोस्टेट ग्रंथि का स्राव (prostatic secretions) प्रोस्टेट की चिकनी पेशियों के संकुचित होने के कारण बहुत से छोटे-छोटे छिद्रों से होकर मूत्रमार्ग में पहुंचता है। यह स्राव शुक्राणुओं को गतिशील बनाए रखने में मदद करता है तथा स्त्री की
योनि की अम्लता को निष्क्रिय (neutrilize) करने में भी मदद करता है।
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